21दिसम्बर 27दिसम्बर तक पूरे देश में साहिबजादे बालदिवस के रूप में मनाया जाता है।
पहले की सरकारें गुलाब के फूल वाले चाचा के जन्म दिवस को बाल दिवस के रूप में मनाया करती थी। असली इतिहास से हम लोगों से सदैव दूर रखा गया था जब से मोदी सरकार आई है उसके बाद से साहिब जादे बलिदान दिवस को 21दिसम्बर से 27दिसम्बर तक पूरे एक सप्ताह का साहिबजादे बालदिवस के रूप में पूरे देश में मनाया जाता है। गुरू गोविन्द सिंह जी के चार पुत्र हुए थे सबसे बड़ा अजीत सिंह का जन्म सन् 1687में, माता सुंदरी से हुआ जो गुरु गोविन्द सिंह की सबसे बड़ी सन्तान थे। उसके बाद बाबा जुझारू सिंह का जन्म सन् 1691को, हुआ था जो गुरु गोविन्द सिंह जी की दूसरी सन्तान माता जीतो से हुआ तीसरी सन्तान बाबा जोरावर सिंह भी माता जीतो हुई। उसके बाद सबसे छोटा पुत्र बाबा फतेह सिंह का,सन 1699को, माता जीतो से हुआ जो गुरु गोविन्द सिंह की चौथी सन्तान थे। जब मुगलों ने गुरू गोविन्द सिंह को घेर लिया था तब चमकौर के युद्ध में बाबा अजीत सिंह की उम्र 17वर्ष और जुझारू सिंह की उम्र 14वर्ष ने मुगलों के अत्याचार के खिलाफ सन् 1704ई, में बहुत ही कम उम्र में मुगलों से लोहा लेते हुए और उनके छक्के छुड़ाते हुए चमकौर युद्ध में शहादत को प्राप्त हुए।
युद्ध में गुरु गोविन्द सिंह का परिवार बिछड़ गया था और माता गुजरी ने अपने दोनों बेटों जोरावर सिंह की उम्र 07वर्ष और फतेहसिंह की उम्र 05वर्ष को लेकर अपने रसोइया गंगू के घर शरण पाने के लिए ढेर सारा सोना अशरफी हीरे-जवाहरात अपने साथ गंगू के घर लेकर गयी।गंगू ने इतना सारा माल हीरे-जवाहरात देखकर ललचाया और मुगलों के सिपाहियों से माता गुजरी और दोनों साहिब जादों को पकड़वा दिया पकड़ सिपाहियों ने नवाब वजीर खान के सामने पेश किया। वजीर खान ने पहले तो लालच दिया और कहा तुम इस्लाम कबूल कर लो तो तुम्हें बहुत सारा धन देंगे और मौज की जिंदगी जिओ। जब दोनों साहिब जादे लालच में नहीं आए तो उनको धमकाया और ठन्डे बुर्ज में डाल दिया और बहुत बड़ी बड़ी यातनाएं दी लेकिन जब किसी प्रकार से दोनों साहिब जादे अपने धर्म पर अडिग रहे और अपने ही धर्म में मरने को तैयार हो गए तो वजीर खान ने दोनों साहिब जादों को सरहिंद की दीवार में जोरावर सिंह की उम्र 07वर्ष और फतेहसिंह की उम्र 05वर्ष थी जोरावर सिंह और फतेहसिंह को जिन्दा दीवार में चुनवा दिया दोनों साहिब जादे दीवार में चुनें जा रहे थे तब बड़े भाई के आंखों से आंसू देख कर छोटे भाई ने कहा भैया देश धर्म के मरने पर संसय कैसा तब बड़े भाई ने कहा भैया मुझे कष्ट इस बात का है कि मैं पहले आया था मुझे पहले जाना चाहिए लेकिन तुम बाद में आए थे और पहले जा रहे हो। दोनों भाईयों,ने कहा हमारे देश की जय हो पिता दशमेश की जय हो हमें निज देश प्यारा है हमें निज धर्म प्यारा है देश धर्म की जय जयकार करते हुए शहादत को प्राप्त हुए।इसी,लिए दिसंबर का महीना स्मरण और श्रद्धा का महीना कहा गया है ।इस कृतज्ञता के महीने में साझा करने अपने और दूसरे जीवन में बदलाव लाकर अध्यात्मिक जागरूकता ऐसे महानायकों से हमें कुछ न कुछ सीखने को मिलता है।साहसी और निडर बनो अध्यात्मिकता और एक निडर योद्धा की भावना के बीच संतुलन बनाए रखना। उन्होंने हमें शेर की तरह साहसी होने के साथ साथ दयालु विनम्र और प्रेम पूर्ण होना सिखाया। अपने मूल्यों की आस्था पर अडिग रहे। अत्याचारियों के लुभावने प्रस्तावों जान से मारने की धमकियों और शारीरिक यातनाओं के वावजूद युवा साहिबजादो ने अपनी अन्तिम सांस तक अपनी आस्था को कायम रखा। और धर्म के लिए शहादत को आगे बढ़ाया साहिब जादे निरंतर सीखने अभ्यास करने और बेहतर इंसान बनने के लिए उत्सुक रहते थे। इस लिए अपनी उपलब्धियों पर गर्व करने के बजाय हमें हर दिन कुछ नया सीखने का प्रयास करना चाहिए और साथ ही अपने कार्य को पूरी लगन और निष्ठा से करना चाहिए। साहिबजादे हमेशा अपने पिता के आदेशों का पालन करते थे।आज हम स्वयं से पूछें कि क्या हम अपने माता-पिता और बड़ों की बातों का कितना पालन करते हैं। गुरु गोविन्द सिंह जी के अनुसार जब सभी साधन बिफल हो जाएं तो अपने अधिकार के लिए हथियार उठाना और लड़ना तुम्हारा अधिकार है हमें योद्धा और संत दोनों बनना चाहिए। इस लिए ईश्वर से जुड़ने का अभ्यास करना चाहिए और अन्याय के विरूद्ध लड़ने से पीछे नहीं हटना चाहिए। दिसंबर स्मरण और श्रद्धा का महीना है अपने और दूसरों के जीवन में बदलाव लाकर अध्यात्मिक जागरूकता का अभ्यास करें।
लेखक गोकरन प्रसाद ब्यूरो चीफ सीतापुर मोबाइल नंबर 7518654968







